कृषि विकास में बाणसागर बहुउद्देशीय परियोजना का योगदान रीवा संभाग के विशेष संदर्भ में

 

डाॅ शीबा खान

सहायक प्राध्यापक (वाणिज्य), शास. इंदिरा कन्या महाविद्यालय, सतना (.प्र.)

 

भारत एक विकासशील एवं कृषि प्रधान देश है जहां की अधिकांश आबादी आज भी गाँवों में निवास करती है। यह गलत नहीं होगा कि प्रथम भारत गाँवों में बसता है। खेती और किसान भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। कृषि देश का सबसे बड़ा उद्योग तो है ही साथ ही हमारी आबादी का लगभग 70 फीसदी हिस्सा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि क्षेत्र से ही रोजगार पाता है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के अनुसार विश्व के 225 सबसे अधिक धनी व्यक्तियों की आय, 2.5 फीसदी गरीबों की आय के बराबर है। सन् 1973 से 2000 के दौरान पाया गया कि विश्व के धनी व्यक्तियों की आय 66 प्रतिशत बढ़ गयी थी। जबकि मध्यम वर्ग की आय 10 प्रतिशत ही बढ़ी। यदि देखा जाय तो ग्रामीण अर्थिक विकास की सम्भावना भारतीय कृषि में ही है। रीवा जिला मध्यप्रदेश का मूलतः कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था वाला जिला है। इस जिले में लोग सदियों से कृषि कार्य करते रहे है। किन्तु परम्परागत कृषि कार्य होने के कारण कृषि उत्पादकता में कमी पाई जाती है। भूमि सुधार एवं सिंचाई के साधनों के अभाव के कारण कृषि की दशा में आवश्यक सुधार संभव नहीं हुए है। बाणसागर परियोजना ने शहरी एवं ग्रामीणअर्थव्यवस्था के विकास में अमूल्य परिवर्तन कर उसे गतिशील एवं विकासवान बनाया है। जिसके कारण व्यक्तियों का जीवन पुनरू आत्म निर्भरता की ओर अग्रसर हुआ हैं। इस प्रकार बाणसागर परियोजना का उद्भव विकास जिले में युगंतकारी घटना है।

 

 

 

प्रस्तावनाः-

भारत एक कृषि प्रधान विकासशील राष्ट्र है। यहाॅ की कुल जनसंख्या का लगभग 72.2 प्रतिशत भाग गांवों में निवास करता है, जो जीविकोपार्जन हेतु पूर्णतः कृषि पर निर्भर है। मध्यप्रदेश का रीवा संभाग कृषि पर आधारित विकासशील क्षेत्र है। यहाॅ की जनसंख्या पूर्ण रूप से कृषि पर निर्भर है।  स्वतंत्रता के पूर्व यहाॅ पर औद्योगिक विकास के बराबर हुआ था, किन्तु स्वतंत्रता के पश्चात् प्राकृतिक संसाधनों की बहुलता के बावजूद इस क्षेत्र का औद्योगिक विकास उतना नही हो पाया जितना प्राकृतिक संसाधनों की स्थिति के अनुसार आवश्यक था, ऐसी स्थिति में इस क्षेत्र की जनसंख्या जीविकोपार्जन के लिए पूर्णतः कृषि पर आश्रित है   यहाॅ की कृषि भी मानसून का जुआ है अच्छी वर्षा होने पर कृषि उत्पादन में वृद्धि होती है और इसके विपरीत अनावृष्टि की स्थिति में कृषि उत्पादन पूर्णतः प्रभावित हो जाता है। 

 

ऐसी स्थिति में इस क्षेत्र में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों विशेष रूप से नदियों के जल को सिंचाई के रूप में किसानों के खेतों तक पहुॅचाने के लिए एवं कृषि पर वर्षा की निर्भरता कम करने के लिए विभिन्न सिंचाई योजनाओं का विस्तार सरकार द्वारा किया गया है। इस संबंध में बाणसागर बहुउद्देशीय परियोजना रीवा संभाग के लिए एक जीवन दायनी परियोजना के रूप में स्थापित की गयी। यह परियोजना मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश एवं बिहार राज्यों के बीच 211 के अनुपात में सोन नदी के पानी के बंटवारे से संबंधित है।      वर्तमान में कृषि विकास के लिए काफी प्रयास किये जा रहे है लेकिन दुर्भाग्य से राष्ट्रीय आय में कृषि क्षेत्र के योगदान में लगातार कमी रही है। जिसके कारणग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। इसके विपरीत कृषि पर आबादी की निर्भरता में बेहद मामूली सी गिरावट ही देखने को मिल रही है। आज हम खाद्यान्न के मामले में आत्म निर्भर जरूर हो गये है, लेकिन इसके लिए हमारे पर्यावरण को बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ रहीहै। खाद्यान्न के मामले में यह आत्म निर्भरता बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं चलने वाली है इसलिए जरूरत इस बात की है कि ग्रामीण आर्थिक विकास की नीतियाँ कृषि क्षेेत्र के अनुरूप बनायी जाये। हमारीग्रामीण विकास की  आर्थिक नीतियाँ इस प्रकार की होनी चाहिये जिनमें कृषि क्षेत्र आत्मनिर्भर हो सके और कृषि क्षे़त्र में रोजगार के नए-नए अवसर पैदा हों खाद्यान्न संबंधी हमारी जरूरते लगातार बढ़ती जा रही है तो दूसरी ओर तथ्य यह है कि कृषि के लिए उपलब्ध भूमि सीमित है। हमारी ग्रामीण आर्थिक विकास की नीतियाँ इस प्रकार की होनी चाहिये कि कृषि क्षेत्र को अधिक से अधिक प्रोत्साहन मिले और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए-नए अवसर सृजित हो।वर्तमान परिदृश्य में कृषि नियोजकों को प्रथमिकता इस असंतुुलन को कम करने और अंततः पूरी तरह समाप्त करने की होनी चाहिये।जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्थासुदृढ़ हो सकेए बहुउ्देशीय बाणसागर परियोजना के विस्तार से सिंचाई रकवा (2012-13) मंे 116000 हे. से बढ़कर (2014-15) मंे  192000 तक पहुँच गया। सिंचाई सुविधा बढ़ने, प्रमाणित बीज रसायनिक उर्वरकों की अधिक उपलब्धता होने उन्नति कृषि यंत्रों के बढ़ने, जैसी अनेक सुविधाओं के कारण धान का उपार्जन वर्ष 2012-13 में 16 हजार मीट्रिक टन, वर्ष  (2013-14) में 100 हजार मीट्रिकटन तथा 2014-15 में 160 हजार मीट्रिक टनतक है। कृषि की यह विकास दर वास्तव में मील का पत्थर बन गई है जो कि कृषिग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक मंथन भरा पहलू है। रीवा जिले में किसान कल्याण तथा कृषि विकास के कार्यो में विगत दो-तीन वर्षो में आशातीत वृद्धि हुई है। जिले का सिंचाई रकवा बढ़ना, उर्वरक प्रदाय हेतु रैंक प्वांइट चालू होना, उन्नतिशील कृषि यंत्रों तथा प्रमाणित बीजों की उपलब्धता बढ़ी है।

 

उद्देश्य:-

1.      कृषि विकास में बाणसागर बहुउद्देशीय परियोजना का योगदान का पता लगाना।

2.      रीवा संभाग में बाणसागर परियोजना भविष्य में कृषि विकास के दिशा में कितना उपयोगी सिद्ध होगा, इसका पता लगाना।

3.      रीवा संभाग में कृषि विकास के मार्ग में कौन-कौन सी बाधाएं हैं, उन बाधाओं से संबंधित आवश्यक सूचनाएं एकत्रित करना।

4.      रीवा संभाग में कृषि विकास हेतु सरकार की योजनाएं कहां तक सफल या असफल रहीं हैं, का पता लगाना।

5.      बाणसागर से सिंचाई के साथ-साथ अन्य सम्बद्ध क्रियाओं से कृषकों को कितना लाभ हुआ है का पता लगाना।

6.      बाणसागर बहुउद्देशीय परियोजना की प्रस्तावित नहरों का निर्माण किस सीमा तक हुआ है का पता लगाना।

7.      शोध क्षेत्र में बाणसागर परियोजना का कृषि गैर-कृषि क्षेत्र में योगदान का विश्लेषणात्मक अध्ययन करना।

8.      बाणसागर के परियोजना के दूष्प्रभावों का अध्ययन करना।

 

शोध प्रविधि:-

शोध प्रविधि या अध्ययन प्रविधि का तात्पर्य किसी भी कार्य को सम्पादित करने के उपयुक्त तरीके से है। ज्ञान के क्षेत्र में शोध कार्य अपरिहार्य है। वर्तमान युग में शोध या अनुसंधान का अत्यधिक महत्व है, क्योंकि किसी भी क्षेत्र से संबंधित तथ्यों का प्रमाणीकरण, नवीनीकरण, एवं सत्यापन अनुसंधान के द्वारा ही किया जा सकता है।

 

शोध कार्य में बाणसागर परियोजना कृषि उत्पादन से सम्बन्धित वास्तविक एवं विश्वसनीय आकड़ो को प्राप्त करने के लिये प्राथमिक एवं द्वितीयक दोनों प्रकार के आकड़ों को एकत्र कर पूर्ण किया गया है। प्राथमिक आकड़े स्वयं कार्य स्थल पर जाकर बाणसागर परियोजना कृषि उत्पादन की  दशा का अध्ययन किया गया। जबकि द्वितीयक आंकड़े सरकार द्वारा चलाये जा रहे योजनाओं से संबंधित विभिन्न प्रकाशित- अप्रकाशित पुस्तकों, शोध पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, शासकीय प्रतिवेदनों आदि से एकत्र कर प्रयोग किये गये हैं। इसके अतिरिक्त लाइब्रेरी, एवं इंटरनेट आदि का भी आकड़ें एवं विषय वस्तु से संबंधित स्टडी मटेरियल एकत्र करने में प्रयोग किया गया है।

 

बाणसागर परियोजना क्षेत्र में सघन कृषि अनुसंधान योजना 1983 में लागू की गई है। परन्तु इन विधियों को कृषकों द्वारा कार्य रूप में अपनाने में अनेको कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसमें सबसे प्रमुख समस्या कृषकों की अशिक्षा एवं निर्धनता है। कृषकों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए सरकार द्वारा परियोजना के अन्तर्गत बहुत सी सुविधाएं कृषकों को उपलब्ध करायी जा रही हैं।

 

 

तथ्यों का संकलन :-

 

उपरोक्त सारणी के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि गेंहू  406.30 हजार हेक्टेयर में बोया गया जिसमें रीवा जिले में 170 हजार हेक्टेयर क्षेत्र, सतना में 140 हजार हेक्टेयर, सीधी में 60 हजार हेक्टेयर, सिगरौली में 36.30 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में बोया गया था। इसी प्रकार धान का क्षेत्र रीवा संभाग में 236.30 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में बोया गया जिसमें रीवा 36.5, सतना 70.20, सीधी 55.50, सिगरौली में 34 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में बोया गया। तीसरे स्थान पर ज्वार का क्षेत्रादान रीवा संभाग में 18.82 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में बोया गया था जिसमें रीवा 4.90 हजार हेक्टेयर मे, सतना में 3.20, सीधी में 8.0 एवं सिगरौली  में 2.72 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में बोया गया था जिसमें रीवा जिले में 2.50 हजार हेक्टेयर में, सतना में 0.80 हजार हेक्टेयर, सीधी में 15.50 हजार हेक्टेयर एवं सिंगरौली में 23.90 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में था।  अन्य फसलों के अंतर्गत रीवा संभाग में 22.61 हजार हेक्टेयर क्षेत्र था जिसमें रीवा में 3.20 हजार हेक्टेयर, सतना में 1.51 हजार हेक्टेयर, सीधी में 9.0 हजार हेक्टेयर एवं सिगरौली इसका क्षेत्र 8.90 हजार हेक्टेयर था। अतः स्पष्ट है कि रीवा संभाग में प्रमुख खाद्य फसलों  का क्षेत्र 726.62 हजार हेक्टेयर पर खाद्य फसलें बोयी गयी थी जिसमें रीवा जिले में कुल बाये गये खाद्य फसलों का क्षेत्र सबसे अधिक 257.1 हजार हेक्टेयर का रीवा जिले के बाद दूसरे स्थान पर सतना जिले का जिसमें 215 हजार हेक्टेयर पर बोया गया था, सीधी जिला तीसरे स्थान पर है जिसमें मुख्य फसलों में बोये गये क्षेत्र 148 हजार हेक्टेयर और सिगरौली जिले का सबसे कम 105.82 हजार हेक्टेयर क्षेत्र था सिंगरौली जिले का रीवा संभाग में अन्य जिलों की अपेक्षा कम क्षेत्र होने का प्रमुख कारण वन एवं कोयला क्षेत्र का अधिक भाग में होना।

 

व्यावसायिक फसलों के उत्पादन का मुख्य उद्देश्य इन्हंे बेचकर अधिक धन प्राप्त करना होता है। किसान इन फसलों के उत्पादन को या तो सम्पूर्ण रूप से बेच देते हैं अथवा आंशिक रूप से उपयोग करते हैं तथा शेष भाग बेंच देते हैं।  जैसे-सोयाबीन, गन्ना, चना, मटर, मूंगफली, सरसो आदि

 

रीवा संभाग में सिंचाई के साधनों में 418 नहरें, 7203 नलकूप, 41963 कुएं 1027 तालाब सिंचाई के प्रमुख स्त्रोत के रूप में प्रयोग में लाये जाते हैं। संभाग में नहरें सिंचाई के साधनों में द्वितीय स्थान पर है जिनके द्वारा लगभग 52891 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की जाती है।

 

 

उपरोक्त सारणी के अवलोकन से स्पष्ट है कि रीवा संभाग में वर्ष 2001.02 में 151887 हेक्टेयर भूमि सिंचित क्षेत्र में आती थी, जिसके अंतर्गत कुल 43016 सिंचाई के साधन हैं वहीं वर्ष 2005.06 में कुल 44032 साधन हैं जिनके माध्यम से 177227 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होती थी, इन साधनों सिंचित क्षेत्र में लगातार वृद्धि होती रही है   संभाग में वर्ष 2010.11 में कुल साधन 44466 हैं, जिससे 207951 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होती थी तथा वर्ष 2014.15 में कुल साधन 50611 थेे वहीं सिंचित क्षेत्र 231173 हेक्टेयर था   अतः यदि सिंचाई साधनों को गति दी जाय और सिंचित क्षेत्र में बढ़ोतरी हो तो कृषि उत्पादन बढ़ाया जा सकता है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अत्यधिक सुदृढ़ किया जा सकता है।

 

राई-सारसो:-

यह अपेक्षाकृत कम महत्व की तिलहन फसल है जो निरा बोये गये क्षेत्र में 0.3 प्रतिशत तथा रबी फसल के 4.0 प्रतिशत भाग में राई-सरसो उगायी जाती है।

यहां के कुल तिलहन का 7.5 प्रतिशत भाग में राई-सारसो के अन्तर्गत हैं। इसके लिये काली दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है। इस प्रकार राई-सरसो की अच्छी उपज हेतु गेहूं उत्पादन क्षेत्रों में हो सकती है लेकिन यहां विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में उगाई जाती है, जैसे बलुई मिट्टी, कंकरीली मिट्टी या लेटराइट मिट्टी इत्यादि। राई-सरसो गेहूं के साथ मिश्रित रूप से उगाया जाता है किन्तु इसकी खेती स्वतंत्र फसल के रूप में ही की जाती है।

 

वितरण:-

बाणसागर अधिग्रहण क्षेत्र में राई-सरसो का सर्वाधिक क्षेत्र त्योंथर तहसील के रायपुर सोनौरी मण्डल एवं रामपुर नैकिन तहसील में मिलता है। यहां सम्पूर्ण परियोजना क्षेत्र के 850 हेक्टेयर क्षेत्र में यह फसल उगायी जाती है। बाणसागर अधिग्रहण क्षेत्र का द्वितीय राई-सरसो क्षेत्र में मऊगंज, सिरमौर तथा चाक रा.नि. मण्डल है जो टमस नदी के कछार में राई सरसो की कृषि की जाती है। अधिग्रहण क्षेत्र का तृतीय राई-सरसो उत्पादक क्षेत्र में गोविन्दगढ़ बनकुइयां मनगवां रा.नि. मण्डल आते हैं।

 

रीवा संभाग में कृषि विकास और उसका भविष्य:-

रीवा संभाग कृषि प्रधान संभाग है, यहां 72.2 प्रतिशत से अधिक निवासरत जनसंख्या प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से कृषि एवं कृषि आधारित उद्योगों में संलग्न है। संभाग में कृषि व्यवसाय होकर व्यक्तियों के जीविका का साधन बना हुआ है। रीवा संभाग का भौगोलिक क्षेत्र 24.13 लाख हेक्टेयर है जिसमें शुद्ध कृषि क्षेत्र 10.79 लाख हेक्टेयर है। जिसमें वर्ष 2010-11 में खरीफ फसल 7.77 लाख हेक्टेयर भूमि पर और रवी के अंतर्गत 7.61 लाख हेक्टेयर पर कृषि की गई। रीवा संभाग में वर्ष 1978 में बाणसागर बहुउद्देशीय परियोजना की स्थापना हो जाने और इस बांध से निकाली गई नहरों द्वारा वर्ष 2007-08 से बाणसागर कमाण्ड एरिया में सिंचाई होने के कारण रीवा संभाग कृषि क्षेत्र में लगातार वृद्धि हो रही है। रीवा संभाग में वर्ष 2010-11 तक सिंचित क्षेत्र का रकवा 35.76 लाख हेक्टेयर जिसवमें द्विफसली कृषि क्षेत्र 5.29 लाख हेक्टेयर है। जिसमें द्विफसली कृषि बोयी जाती हैं रीवा ंसभाग में चार जिले आते हैं, इन जिलों में तीन जिलों बाणसागर बहुउद्देशीय परियोजना द्वारा सिंचाई प्रस्तावित है। जबकि सिंगरौली जो रीवा संभाग में अभी नया जिला बना है बाणसागर परिक्षेत्र के बाहर है। रीवा संभाग की कुल जनसंख्या 6897010 है। जिसमें 48,27,907 के लगभग जनसंख्या कृषि एवं कृषि से संबंधित सहायक कार्यो में संलग्न है। रीवा संभाग में निम्न क्षेत्रों में कृषि विकास की संभावनायें हैं।

 

निष्कर्ष:-

बाणसागर बहुउद्देशीय परियोजना रीवा संभाग के लिए जीवन दायनी परियोजना है जिससे यहाॅ की कृषि क्षेत्र में चमत्कारिक विकास की संभावनाएॅ हैं, बाणसागर बहुउद्देशीय परियोजना ही इस क्षेत्र के विकास के नये द्वार खुलेगें और किसानों का जीवन उन्नत एवं खुशहाल होगा किन्तु बाणसागर बहुउद्देशीय परियोजना में कृषि विकास से संबंधित कुछ ऐसी समस्याएॅ भी विद्यमान है जिनके समाधान के बिना इस परियोजना से अपेक्षित लाभ मिलना संभव नही हो रहा है इस परियोजना से जुड़ी कृषि विकास से संबंधित समस्याओं का समाधान करके ही हम कृषि क्षेत्र में अपेक्षित विकास कर कृषि उत्पादन और उत्पाकता के उच्च शिखर तक पहुॅच सकते हैं

 

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Received on 07.09.2018                Modified on 18.09.2018

Accepted on 26.09.2018            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(3):355-359.